1 Apr 2019
Traveler's Desk

आऊंगी मैं बार बार 

 

हमारे एक शुभेच्छु ने गोवा प्रवास के बाद अपने मनोभाव हमारे साथ साझा किये हैं, जिसे हम आपके लिये यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। आशा करते हैं कि आप ऐसे ही अपना सहयोग और स्नेह हमें देते रहें और पुनश्च आपकी उत्तम सेवा का अवसर मिले।  

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गोवा मतलब सैलानियों का स्वर्ग, सागर तट का मोती, कोंकण का हीरा  

गोवा  एक जगह ही नहीं बल्कि एक एहसास है, एक emotion है। नयी पीढ़ी के लिये ये प्रतीक है स्वछंदता का, स्वतंत्रता का।  पहले के समय में जब कोई अपनी सभी जिम्मेदारियों जैसे परिवार की देख रेख, बच्चों की पढ़ाई को पूरा कर लेता तो उस स्वछंदता के लिये, अब तो गंगा नहा लिये जैसे मुहावरे कहे जाते थे। आज के आपा-धापी वाले समय में, इस स्वतंत्रता की खुराक की जरुरत थोड़ी जल्दी-जल्दी ही पड़ती है  और आज का नया मुहावरा है ये काम हो जाये बस फिर गोवा चलते हैंहम तो इस मुहावरे को बार-बार जीने की कोशिश कर रहे हैं।  

गोवा अटा पड़ा है स्थापत्य कला के बेहतरीन नमूनों से  मंदिर, गिरजे, पुरानी हवेलियां  सब एक से बढ़कर एक। हर कोना अपने आप में इतिहास को समेटे हुए, भविष्य की प्रतीक्षा में व्यस्त है। जितने देखते हैं उतना ही और देखने की इच्छा प्रबल होती जाती है।  

गोवा में शांति का एक अलग ही स्तर है। सागर तट पर जब आपके सामने अथाह समुद्र हो और अनंत की संख्या में लहरें अनवरत बनती-लय होती हों, तब अनायास ही प्रकृति की विशालता का आभास हो आता है। यह कोई बड़ी बात नहीं कि सागर गर्जना के पीछे छिपी शांति के क्षणों मेंअंदर के रचनाकार को उभरने की शक्ति मिले। गोवा के लिये, मन के इन्हीं भावों को शब्दों में रखने का प्रयास किया है 

आऊंगी मैं बार बार

एक नयी लहर बनाने को, फिर किनारे पर खो जाने को
सुबह की श्वेत धारा बन कर, सांझ सुनहरी काया बन कर
खिलखिलाती, थोड़ा सकुचाती, अनंत में सिमट जाने को
आऊंगी मैं बार बार

निहित निरंतर सम्मोहित कर अमिट छाप छोड़ जाना हो,
या फिर मुरझाये मन को जीवन से तर कर जाना हो,
फिर कभी बस ऐसे ही, बावरी हवाओं पर सवार हो कर,
बिना किसी शर्त, लहराती, तट पर बिछ जाउंगी बार बार
आऊंगी मैं बार बार

मैं नयी हूँ और पुरानी भी, अल्हड़ हूँ और सयानी भी
मन के विषाद मिटाने को, नूतन अनुराग सुनाने को,
करने जीवन का संचार
आऊंगी मैं बार बार

– स्वस्तिका पाठक

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Bagdolo परिवार की ओर से एक बार फिर आपको गोवा का निमंत्रण, नमस्कार। 

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